वो खत कभी लिखी ही नही Hindi Sad Poetry By Shekhar Sharma

वो खत कभी लिखी ही नही, जिसका मैं हर रोज जवाब लिखता हूं….

वो सपना कभी पूरा होगा ही नही, जिसका मैं हर रातें ख्वाब देखता हूं…

वो मेरी कभी होगी ही नही, जिसके लिए मैं बेताब रहता हुँ…

वो समंदर थी ही नही, जिस समंदर का मैं सैलाब रहता हूं….

वो आँशु थी ही नही, जिसके लिए मैं दिन रात रोता हूँ….

वो बाग थी ही नही, जिस बाग का मैं फूल रहता हूं….

वो दिल थी ही नही, जिस दिल का मैं धड़कन रहता हूँ….

वो वक़्त थी ही नही, जिस वक्त का मैं समय रहता हूँ….

वो पिंजरा थी ही नही, जिस पिंजरे का मैं पंछी रहता हूं…

वो चांद थी ही नही, जिस चाँद का मैं रोशनी रहता हूं….

वो पेड़ थी ही नही, जिस पेड़ का मैं छाओं रहता हूं…

वो शायरी थी ही नही, जिस सायरी का मैं शायर रहता हूँ…

वो मंजिल थी ही नही, जिस मंजिल का मैं रास्ता रहता हूँ…

वो पल थी ही नही, जिस पल का मैं यादें रहता हूँ…

वो दर्द थी ही नही, जिस दर्द का मैं दवा रहता हूँ..

वो शराब थी ही नही, जिस शराब का मैं नशा रहता हूं…

वो गीत थी ही नही, जिस गीत को मैं गुनगुनाया करता हूं…

वो तस्वीर थी ही नही, जिस तस्वीर का मैं रोज दीदार करता हूँ…

वो आंधी थी ही नही, जिसका मैं तूफान रहता हूं…

वो पतंग थी ही नही, जिस पतंग का मैं आसमान रहता हूं…

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